इस विपत्ति में भी बैर भँजाने वालों की सजा क्या हो!ज्वलंत/जयराम शुक्ल

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इस विपत्ति में भी बैर भँजाने वालों की सजा क्या हो!ज्वलंत/जयराम शुक्ल




इस विपत्ति में भी बैर भँजाने वालों की सजा क्या हो!  ज्वलंत/जयराम शुक्ल



टाइटैनिक फिल्म आपने भी देखी होगी, ग्लैशियर से टकराकर डूबते हुए जहाज़ की कहानी। किशोर प्रेम की मूलकथा के साथ विपत्तिकाल में भी जहाज़ के भीतर कई उपकथाएं चलती है।

 जहाज के डेक पर आर्केस्ट्रा अपने धुन में मस्त है। एक वायलिन वादक मृत्यु की ताल पर सुर लहरी छेड़े है। जहाज के कप्तान और क्रू-मेंबर इस प्रयत्न में हैं कि ज्यादा से ज्यादा जिंदगियां कैसे बचाई जा सकती हैं। 

यात्रियों में कुछ अराजक तत्व भी हैं जो लाइफबोटस् की छीनाछपटी करने लगते हैं। जहाज़ का कप्तान यात्रियों को एक-एक करके छोटी नावों में उतार रहा है। इतने में वही अराजक तत्व हुडदंग मचाते हुए व्यवस्था व अनुशासन को तोड़ने लगते हैं। 

जहाज का कप्तान उन्हें सुधरने की चेतावनी देता है..एक..दो..तीन..फिर धाँय..धाँय..। दो लाशें  गिरती हैं..और सबकुछ फिर सँभल जाता है। यात्री अनुशासित तरीक़े से एक-एक करके छोटी नाव से उतरते हैं।

 डूब रहे जहाज में भी जिंदगियां उतराती हैं..सँभलती हैं..किनारे पर जाकर खड़ी हो जाती हैं।

इस फिल्मी दृष्य को हम भारत में करोना संकट के बरक्स देखते हैं। हम देख रहे हैं कि मौत के मुँहपर खड़े एक विशेष समूह के कुछ तत्व व्यवस्था और अनुशासन को इससे भी ज्यादा अराजक तरीके से तोड़ने पर तुले हैं।

 ऐसे में तब्लीगी जमात के सरगना मौलाना साद जैसों की सजा क्या होनी चाहिए.. बताने की जरूरत नहीं बचती।

 विपत्तिकाल में कोई अनजाने ही बाधक बन जाए यह अलग बात है लेकिन जो संकट को ही अवसर मानकर विपदा का और विस्तार करे यह कदापि क्षम्य नहीं। उसकी वही सजा होनी चाहिए जो उस टाइटैनिक जहाज के कप्तान ने सूझबूझ के साथ दी थी।

करोना पीड़ितों की जान बचाने, और महामारी को नियंत्रित करने में लगे योद्धाओं पर हमले-दर-हमले हो रहे हैं। इंदौर से यह सिलसिला शुरू हुआ..मुरादाबाद, औरंगाबाद, मुंबई और भी कई शहरों की बस्तियों में ऐसा हुआ और हो रहा है, राजस्थान के टोंक जिले से आज ही ऐसी खबर आई। 

देवदूतों पर छतों से पत्थर बरसाए जा रहे हैं..। माँ बहनों की भाँति सेवा में जुटी नर्सों के ऊपर थूका जा रहा है। उनसे अश्लीलता की जा रही है। राजस्थान के  कोटा में थूक से भरी थैलियां फेकी जा रही हैं, ऐसी भी घटना टीवी पर देखी। कहीं करेंसी में थूक लगाकर संक्रमण फैलाने की कोशिशें हो रही हैं। 

करोना पीड़ितों की सेवा करते हुए..नर्स, डाक्टर संक्रमित हो रहे हैं, मर रहे हैं। व्यवस्था बनाने में जुटे पुलिस के लोग भी इस महामारी के जद में आ रहे हैं।

 महामारी फैलने से ज्यादा फैलाई जा रही है..क्यों..! क्यों फिदायीनों की भाँति देश भर के शहरों में करोना बम सक्रिय हैं..? इनकी तह तक जाना जरूरी हो जाता है। और जरूरी हो जाता है उन साँपों के विषदंत तोड़ना जो देश की अस्तीन में छुपे हैं और डसते जा रहे हैं। इससे भी ज्यादा जरूरी है ऐसे लोगों को  निपर्द करना जो टीवी चैनलों और उससे बाहर इन करोना फिदायीनों की ढाल बनने और गंभीरता को मजहबी मसखरी से ढ़कने का काम कर रहे हैं।

 इन तत्वों की जमात/गिरोह/समूह से जुड़ी अबतक की घटनाओं की क्रोनोलाजी पहले समझना होगा। भारत में करोना का प्रवेश उनदिनों होता है जब दिल्ली सुलग रही थी। दंगे की लपटों, पत्थर, छुरा, पेट्रोलबमों से लाशें बिछ चुकी थी। आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति शुरू हो गई थी। 

करोना की दस्तक से पहले ये दंगे नागरिकता से जुड़े कानून के मुद्दे को अस्त्र बनाकर भड़काए गए। नागरिकता कानून दिसंबर में पास हुआ। इस दिसंबर के पहले जेएनयू में..भारत तेरे टुकड़े होंगे..इंशा अल्ला.. इंशा अल्लाह का लंबा दौर चला था। 

इससे पहले उत्तरप्रदेश में गोकशी की कुछ सच्ची-झूठी घटनाओं को आधार बनाकर अवार्ड वापसी हो चुकी थी।  'अवार्ड वापसी गैंग' पूरे देश में वैचारिक रूप से, लेखों और भाषणों के माध्यमों से यह वातावरण बना रहा था कि नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में देश तानाशाही और पतन की ओर जा रहा है।

 खासतौर पर यह प्रचारित किया जा रहा था कि मुसलमानों को सतर्क रहने की जरूरत है क्योंकि कुछ दिन बाद यहां वही होने जा रहा है जो हिटलर की जर्मनी में यहूदियों के साथ हुआ था।

पेट्रो एवं यूरो डालर पर पलने वाले मदरसे और मिशनरीज में जहर की फसलें बोई जा रही थी। नार्थ ईस्ट के बेल्ट, और वनवासी पट्टी में धर्म बदलने का जोर था। सामान्य उन्नत वर्ग में हार्दिक पटेल, छात्रों/युवाओं के बीच कन्हैया कुमार, दलितों के मध्य देश और समाज के प्रति नफरत बोने वाले चंद्रशेखर रावण जैसे चेहरे आयकन बनने की होड़ में थे। 

बारबर राव, गौतम नवलखा जैसे लोग माओवादियों के स्लीपर सेल की सुरंगे बिछा रहे थे। हर कहीं कोरा-भीमागाँव दोहराने की योजनाएं बन रहीं थी।

 कुलमिलाकर एक ऐसा समवेत प्रयास पिछले छह वर्षों से चल रहा था कि नरेन्द्र मोदी और उनके नेतृत्व वाली राष्ट्रवादी सरकार को कहाँ-कहाँ और कैसे-कैसे भँवर में फँसाया जा सकता है। इन ताकतों ने जहां भी जितना उलझाने का प्रयास किया मोदी का प्रभावी नेतृत्व निपटता गया।

  पिछली बारी में मोदी सरकार ने जब तीन तलाक के निषेध का कानून बनाया और इसके तत्काल बाद हुए उत्तरप्रदेश के चुनाव में भाजपा को भारी सफलता मिली तो इन सबके तोते उड़ गए। समीक्षकों ने कहा मुश्लिम महिलाओं ने इस बार नर्क से मुक्ति के लिए वोट दिया है। 

मोदी विरोधियों को यह इतना नागवर लगा कि वे सोचने लगे कि ऐसा क्या किया जाए कि मुस्लिम महिलाओं का मोदी से भरोसा टूट जाए। 

मोदी 2.0 में कश्मीर से जुड़े अनुच्छेद 370 के विलोपन और सुप्रीमकोर्ट द्वारा राममंदिर के निर्माण का पथ प्रशस्त होने के बाद तो..मोदी विरोधियों में करो या मरो..का भाव जाग गया। इस बीच नागरिक संशोधन विधेयक कानून बनकर व्यवहार मेंं आ गया। राष्ट्रविरोधी तत्वों ने इसपर विवाद खड़ाकर अस्त्र की तरह इस्तेमाल करते हुए मुस्लिमों को अपने तीर का 'फर' बना दिया।

 तीन तलाक कानून के बाद मुट्ठी से बाहर हो रही मुस्लिम महिलाएं वातावरण को सुलगाने के लिए ईंधन की तरह इस्तेमाल की गई।  शाहीबाग माडल खड़ा किया गया। देशभर में छोटे छोटे शाहीनबाग बनाने की कोशिशें हुईंं। यहाँ खुलेआम देश के चिकन नेक(असम को शेष भारत से जोड़ने वाला क्षेत्र) को हलाल करने जैसी तकरीरें हुईं। 

देश में करोना संकट के दस्तक दिये जाने के बाद भी शाहीनबाग सजा रहा, अरुंधति राय की तकरीरें, रामचंद्र गुहा के नित नए विमर्श और रोमिला थापर जैसों के आग भड़काऊ साक्षात्कार होते रहे और उनका हेट कंपेन इस संकट में और भी प्रबल होता जा रहा हो। इसे इंतेहा ही कहेंगे कि बुकर पुरस्कार से चर्चित अरंधती अब यह कह रही हैं कि 'करोना' के भय की आड़ में मुसलमानों के नरसंहार की कोशिश की जा रही है। उनके सुर में ताल मिलाने वाले नराधमों की कमी नहीं।

 शुरुआत में तो यह बात फैलाने की कोशिशें हुईं कि इस करोना में महामारी जैसा कुछ नहीं, यह नरेन्द्र मोदी का नया प्रपंच है। प्रधानमंत्री ने जब सतर्कता की दृष्टि से 22 मार्च को जनता कर्फ्यू का आह्वान किया तो एक पद्मधारी विद्वान ने  बेशर्मी के साथ इसे नमो-कर्फ्यू का नाम दे दिया । 

इस बीच बौद्धिकों ने मुस्लिम समुदाय और खासकर महिलाओं के बीच सरकार और इस देश के खिलाफ इतना जहय भर दिया गया था कि करोना के बचाव के लिए गली गली उतरे डाक्टर, नर्स और सेवादार भी उन्हें मोदी के आदमी लगने लगे। 

कहीं-कहीं तो जब स्वास्थ्य विभाग का अमला टेस्ट करने गया तो पुरुषों ने ही नहीं महिलाओं ने भी अपना नाम नरेन्द्र मोदी और शाह बताना शुरू किया। इसी बात की अपील अरुंधती राय और कांग्रेस/कम्युनिस्ट के कुछ बड़े नेताओं ने की थी। मोदी और शाह को रंगा-बिल्ला कहकर मजाक उड़ाया गया। यह एक तरह से जाम्मियामिलिया और शाहीनबाग की कोख से उपजी दुर्भावना का विस्तार ही है।

मुस्लिम समुदाय और खासतौर पर जो कौंसलिंग/ब्रेनवॉशिंग नागरिकता कानून को लेकर की गई थी करोना संकट में वही उभरकर दिखने लगी है। इधर मौलाना साद जैसे जाहिल और राष्ट्रघातियों ने इस संकट में भी एक अवसर देखा। फैला सको तो फैलाओ.. जितना हो सके। मरना पड़े तो मरो और ज्यादा से ज्यादा काफिरों को मारो, के फतवे के साथ। 

देश को तबाह करने के लिए निजामुद्दीन की मरकज से जमाती उसी तरह करोना बम बनकर निकल रहे हैं जिस तरह पीओके के लांचपैड्स से आतंकवादियों के फिदायीन जत्थे निकलते हैं। देश में आधे से ज्यादा संक्रमण इन्हीं जमातियों के जरिए फैला है। 

इस बीच बौद्धिकों की डर्टी ट्रिक्स भी अपनी जगह काम कर रही है। सोशलमीडिया से अफवाहें फैल रही हैं कि बस्तियों में आने वाले डाक्टर और पुलिस मोदी के लोग हैं जो करोना का इंजेक्शन लगाएंगे और ले जाकर डिटेंशन सेंटर में बेंड़ देंगे। 

जो बौद्धिक/राजनीतिक तबका मोदी विरोध में मुसलमानों को चारा बना लिया है उससे यह उम्मीद करना बेमानी है कि वे आज इस संकट की घड़ी में करोना से बचने के लिए नियम-अनुशासन के पालन की अपील करें। इसीलिए इस परिदृश्य में न तो आपको 'एवार्ड वापसी गैंग' कहीं दिख रहा है और न ही जेएनयू के वे बुद्धिभक्षी। 

वो जो अराजक आंदोलनों के जरिए आयकन की तरह उभर रहे थे सबके सब घरों में सेल्फ क्वरांटीन हैं..दारूदक्कड़ के साथ थकान मिटा रहे हैं।

करोना का संकट कल सिमटता है या सुरसा के मुँह की भाँति विस्तार पाता है कोई कुछ नहीं कह सकता, फिलहाल वैज्ञानिक भी नहीं। और ऐसे में इस विपत्ति को फैलाने में कोई उत्प्रेरक/सहायक बनता है तो उसके साथ कैसा सलूक होना चाहिए..? 

मेरी राय में तो ठीक वैसा ही जैसा कि टाइटैनिक फिल्म में  कप्तान ने उन अराजक  तत्वों के साथ किया था जो जहाज ही डुबाने मे लगे थे..। आपकी राय क्या है आप जानें।

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