“झालमुड़ी की खुशबू में लिपटी जीत: बंगाल में भाजपा की प्रचंड विजय और सियासत का नया स्वाद”

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“झालमुड़ी की खुशबू में लिपटी जीत: बंगाल में भाजपा की प्रचंड विजय और सियासत का नया स्वाद”


झालमुड़ी की खुशबू में लिपटी जीत: बंगाल में भाजपा की प्रचंड विजय और सियासत का नया स्वाद”


रवि शुक्ला

राजनीति में मुद्दे बदलते रहते हैं, लेकिन इस बार पश्चिम बंगाल की सियासत में स्वाद ने भी एंट्री मार दी है। भाजपा की प्रचंड जीत के बाद जिस चीज़ ने सबसे ज्यादा सुर्खियां बटोरीं, वह न तो लंबी रैलियां थीं और न ही तीखे भाषण—बल्कि एक साधारण-सी ‘झालमुड़ी’ थी। जी हां, वही सड़क किनारे मिलने वाला मसालेदार नाश्ता, जिसे खाते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीरें अब सोशल मीडिया पर “विजय का सीक्रेट फॉर्मूला” बताई जा रही हैं।

अब यह कहना मुश्किल है कि जीत रणनीति की थी, संगठन की थी या फिर उस चटपटे स्वाद की, लेकिन ट्रेंड देखकर लगता है कि देश की जनता अब “मेनिफेस्टो” से ज्यादा “मेन्यू” पर ध्यान देने लगी है। सोशल मीडिया पर #JhalmuriVictory और #ModiMagic जैसे हैशटैग ऐसे चल रहे हैं, मानो चुनाव आयोग को भी अब नतीजों के साथ रेसिपी जारी करनी पड़ेगी।

बंगाल की राजनीति हमेशा से ही भावनाओं, संस्कृति और पहचान के इर्द-गिर्द घूमती रही है। लेकिन इस बार ‘झालमुड़ी’ ने मानो इन सबको एक साथ मिला दिया—मूंगफली की तरह मजबूत, मिर्च की तरह तीखी और सरसों के तेल की तरह असरदार। सवाल यह नहीं कि भाजपा कैसे जीती, बल्कि यह है कि क्या अब हर चुनाव में नेताओं को स्थानीय व्यंजन चखना अनिवार्य हो जाएगा?

व्यंग्य की बात अलग है, लेकिन यह भी सच है कि राजनीति में प्रतीक बहुत मायने रखते हैं। एक प्लेट झालमुड़ी शायद उस जुड़ाव का प्रतीक बन गई, जो नेता और जनता के बीच बनता है। हालांकि, अगर यही फॉर्मूला आगे चला, तो आने वाले चुनावों में लिट्टी-चोखा, ढोकला और वड़ा-पाव भी अपनी-अपनी “राजनीतिक भूमिका” निभाते नजर आएंगे।

फिलहाल, बंगाल में जीत का स्वाद ‘झालमुड़ी’ जैसा ही चटपटा है—और सोशल मीडिया इसे चटखारे लेकर परोस रहा है। राजनीति का यह नया “फूड ट्रेंड” कितना टिकेगा, यह तो वक्त बताएगा, लेकिन अभी के लिए इतना तय है कि इस जीत में नमक, मिर्च और व्यंग्य—तीनों बराबर मात्रा में मौजूद हैं।

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