"चुनाव खत्म, अब बचत शुरू "PM की बचत की अपील का सटीक और शानदार व्यंग्य लेख

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"चुनाव खत्म, अब बचत शुरू "PM की बचत की अपील का सटीक और शानदार व्यंग्य लेख



चुनाव खत्म, अब बचत शुरू ; PM की बचत की अपील का सटीक और शानदार व्यंग्य लेख,
जनता पूछ रही है:चुनावी रैलियों में कौन-सा ईंधन जलता था?, 

रवि शुक्ला
देश में चुनाव खत्म होते ही अचानक राष्ट्रहित का नया अध्याय खुल गया है।
48 घंटे के भीतर प्रधानमंत्री Narendra Modi ने देशवासियों से दो बार अपीलें कर डालीं—पेट्रोल बचाइए, डीज़ल कम खर्च करिए, इलेक्ट्रिक वाहन अपनाइए, मेट्रो-बस से चलिए, एक साल तक सोना-चांदी मत खरीदिए, खाने के तेल की खपत घटाइए, किसान जैविक खाद अपनाएं.जनता ने टीवी पर यह सब सुना और थोड़ा भावुक भी हुई. किसी ने बाइक की चाबी को ऐसे देखा जैसे अब वह पेट्रोल नहीं, भावनाएं पीती हो.किसी ने सोचा—“अब शादी में सोने की जगह स्टील का सेट ही सही.”और कुछ लोगों ने ऑफिस में मैसेज भेज दिया—“सर, राष्ट्रहित में आज से वर्क फ्रॉम होम.”

लेकिन तभी जनता के दिमाग में चुनावी दृश्य घूमने लगे,
वही लंबी-लंबी रैलियां,सैकड़ों गाड़ियों के काफिले,रोड शो में किलोमीटरों लंबा ट्रैफिक,हेलिकॉप्टर, मंच, लाइटें, कैमरे और भाषण,अब जनता पूछ रही है—“क्या उस समय पेट्रोल डीज़ल पानी से चल रहा था?”

व्यंग्य यहीं पैदा होता है

चुनाव से पहले सत्ता पक्ष लगातार कह रहा था—“देश में तेल की कोई कमी नहीं।”विपक्ष पर आरोप था कि वह अफवाह फैा रहा है,लेकिन चुनाव परिणाम आने के सिर्फ सात दिन बाद अचानक बचत की राष्ट्रीय चेतना क्यों जाग गई?अगर पश्चिम बंगाल चुनाव का हिसाब देखें तो तस्वीर और दिलचस्प हो जाती है, प्रधानमंत्री ने करीब 17 रैलियां और 2 रोड शो किए,
गृह मंत्री Amit Shah ने 40 से ज्यादा जनसभाएं और कई रोड शो किए,Yogi Adityanath ने दर्जनों सभाएं की, और Mamata Banerjee भी लगभग कई दर्जन रोड शो की राजनीति में पीछे नहीं रहीं

जनता अब गणित लगा रही है—“अगर मैं स्कूटी कम चलाऊं और नेता जी का काफिला वैसे ही चलता रहे, तो देश की कुल बचत में मेरा योगदान ‘नगण्य’ कहलाएगा या ‘राष्ट्रनिर्माण’?”
सोना न खरीदने वाली अपील भी कम रोचक नहीं है,भारत में सोना सिर्फ धातु नहीं, सामाजिक प्रतिष्ठा का स्थायी भाव है,यहां शादी में रिश्तेदार दूल्हे से ज्यादा गहनों का वजन नोट करते हैं,अब सरकार कह रही है—“एक साल तक सोना मत खरीदिए ”जनता पूछ रही है—“ठीक है, लेकिन बेटी की शादी में क्या आशीर्वाद के साथ डिजिटल गोल्ड का स्क्रीनशॉट दें?”
इधर खबरें यह भी कहती हैं कि सरकार ने खुद काफी मात्रा में सोना खरीदा है.तो आम आदमी के मन में सवाल उठना स्वाभाविक है—“सरकार के लिए सोना निवेश है और जनता के लिए विलासिता?”वर्क फ्रॉम होम वाली सलाह भी कम दिलचस्प नहीं.ऐसा लग रहा है जैसे देश को फिर से कोरोना काल की याद दिलाई जा रही हो.फर्क सिर्फ इतना है—
तब वायरस बाहर था, अब महंगाई का डर अंदर है.
विपक्ष अब हमलावर है
वह पूछ रहा है—“क्या आने वाले दिनों में तेल, गैस और महंगाई की नई मार पड़ने वाली है?” और सबसे बड़ा सवाल—
“क्या मंत्री और नेता भी अब मेट्रो और बस से चलेंगे, या यह सलाह सिर्फ आम आदमी के लिए है?” असल मुद्दा यह नहीं कि अपील गलत है.बचत करना अच्छी बात है.कम ईंधन खर्च करना भी जरूरी है.लेकिन लोकतंत्र में सवाल यह भी पूछा जाएगा कि—“क्या अपील और व्यवहार एक ही सड़क पर चलते हैं, या अलग-अलग लेन में?”क्योंकि जनता अब सिर्फ सुनती नहीं, तुलना भी करती है।
नोट:हमारे इस लेख को लिखने का उद्देश्य यह नहीं की किसी डराना या गलत मैसेज करना है जो अब जनता के सवाल हैं और विपक्ष हमलावर है उसी को इसमें लिखने का प्रयास किया गया है,यह लेख आपको कैसा लगा कमेंट करके बताएं और लोगों को शेयर करें।


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