“गुस्से से गुज़रते हुए सुकून तक की यात्रा” डॉ.संतोष तिवारी का लेख
मै पिछले लंबे समय से गुस्से से भरा हुआ हूँ। मुझे अनियंत्रित होने की हद तक गुस्सा आता है। जब चित्त शांत होता है तब विचार करते हुए पाता हूँ कि, बक़ौल फ़ैज़, “वो बात जिसका फ़साने में कोई जिक्र न था” वो बात मुझे नागवार क्यों गुजरती है? हर बार की तरह इसी नतीजे पर पहुँचता हूँ कि मैं गलत था। मैं पश्चाताप से भर जाता हूँ। अब लगभग प्रतिदिन यह क्रम चलने लगा है. इन सबसे निकलने की बजाय मैं और गहरे धँसता जा रहा हूँ। मुझे इससे निकलने का मार्ग भी मालूम है पर मैं निकल नहीं पा रहा या यूँ कहा जाय कि निकलना नहीं चाहता! इस सन्दर्भ में अन्तर्द्वद है। खैर, एक बात इन सबके बावजूद अच्छी हो रही है कि अभी भी सही और गलत का फर्क महसूस कर पा रहा हूँ। घूमने, पढ़ने और किताबों से दोस्ती अब भी बनी हुई है। जॉन एलिया साहब का शेर “मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें/मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं” मुझे अभी भी रोमांचित करता है। घूमने और पढ़ने की इस बला ने मुझे कई अच्छे लोगों से मिलवाया। एक बात और जोड़ता चलूँ। मैं जिस इलाके में रहता हूँ वह उस “दरिद्र” भूगोल में से है जहाँ लोगों के पास सिर्फ और सिर्फ सपने हैं। आधुनिक सुविधाओं के नाम पर दो कमरों का पक्का मकान, एक कामचलाऊ मोटर साईकिल और मुश्किल से जुटाए गए कुछ कपड़े तथा दो जून की रोटियां। और एक एंड्राएड फोन। जिसमें यदि रिचार्ज रहा और डेटा हुआ तो आभासी दुनिया में गुम जरुर हुआ जा सकता है। परिणामस्वरूप समय तो कट रहा है पर आँखों से नीद गायब होती जा रही है। दूसरा, दुनियावी रूप से सफल न हो पाने की हताशा ने मुझे इतना घेर लिया है कि मेरा अपने आप से भरोसा उठता चला जा रहा है. इकतालीस की उम्र पार कर चुकने के बाद लगता है कि अपने पास जीवन में हासिल कुछ नहीं है। दुनियावी सफलता के जो मानक हैं उनसे कोसों दूर हैं हम। मन इतना अनमना था कि कहीं सुकून न मिल पा रहा था। बार बार लगता था कि कहीं घूम आया जाय। सभी पहलुओं को मित्रों से साझा किया तो उन्होंने भी सलाह दी कि मुझे आप पहाड़ों में घूमना चाहिए। मौसम बदल जायेगा तो शायद मूड चेंज हो जाये. हम जिन परिवारों से संबंध रखते है वहां घूमने के नाम पर सिर्फ धार्मिक यात्राएँ प्रचलन में हैं। यदि किसी ने अन्य जगह घूमने के बारे में सोचा भी तो जेब परमीशन नहीं देता. खैर..............।
एक
अर्चना जी से मेरी पहली मुलाकात जनवरी २०२५ में पुस्तक मेले के दौरान “खुरदुरे पत्थर” के विमोचन के अवसर पर हुई. शहडोल ज़िले के चर्चित गांधीवादी और लेखक सन्तोष भाई साहब ने तब अर्चना जी से परिचय कराते हुए कहा था कि ये डॉ सन्तोष है जो पढ़ने और घूमने में यकीं रखते हैं। उसी दौरान हम दोनों ने एक दूसरे के मोबाइल नंबर ले लिया था। फिर इस बार जब योजना बनी तो मैंने अर्चना जी से बात की। उन्होंने उत्साह से कहा, “आ जाइये!”
मैं गुप्तकाशी जाने की तैयारी करने लगा। इस बीच सन्तोष जी से बात हुई तो उन्होंने कहा, “आप बेहिचक जाइये, आपको आनंद आएगा। बच्चों से मिलिए। बातचीत कीजिये। आपको नया अनुभव मिलेगा।”
गुप्तकाशी पहुँचें पर मुझे बताया गया कि २००८ में अर्चना जी के साथ नौ लड़कियां भारत की यात्रा पर निकली थीं। उनका उद्देश्य जीवन जीने के नए तरीकों, काम करने की विभिन्न पद्धतियों और विभिन्न तरह के जीवनानुभवों से परिचित होना था।इस यात्रा के दौरान वो अलग अलग परिवेश, अपरिचित विचारों के समझने के क्रम में विभिन्न दृष्टिकोण वाले लोगों से मिलीं। यह एक ऐसा साल था जिसमें विविधता का स्वागत करने वाले कुछ लोग प्रकृति के सानिध्य में साथ साथ समूह में रहने लगे। २००९ के आस पास केदार घाटी के गांव खुमेरा में स्थित श्यामवन में इस यात्रा का अगला पड़ाव था, जिसमें यह समूह घने जंगलों के बीच, वन्यजीवन की उपस्थिति और पास बहती नदी के पास घर बनाकर सह अस्तित्व की भावना के साथ रहने लगा। फिर कुछ बच्चे भी साथ आये और बड़े तथा बच्चों के साथ ने आपस में सीखने समझने के नए द्वार खोले और यह एक प्रायोगिक शिक्षण संस्थान के रूप में उभरने लगा.
दो :-
गुप्तकाशी से 5 किलोमीटर दूर देवर गांव में दीप्तकुल स्थित है। दीप्तकुल एक जीवंत, प्रायोगिक और रचनात्मक शिक्षण संस्थान है जिसका उद्देश्य प्रकृति के साथ सामंजस्य बैठाते हुए जीवन को अनुभव करना, लोकज्ञान तथा रचनात्मकता को निखारना है। यहाँ का वातावरण बहुत अच्छा है। विभिन्न राज्यों से आये हुए बच्चे तथा शिक्षक एक साथ मिलकर सीखते सिखाते तथा एक दूसरे के अनुभव से समृद्ध होते रहते हैं। विविध तरह की जीवन शैलियों, भाषाई विविधता और जीवन अनुभवों के बीच यह स्थान लैंगिक समानता, अपनत्व, परस्पर सहयोग और रचनात्मकता का सुन्दर केंद्रबिंदु है. इस स्कूल के परिसर में रहते हुए हमने महसूस किया कि प्रकृति आप को जीवन यापन के लिए सब कुछ देती है। लेकिन, उसके उपयोग की दृष्टि आपके पास होनी चाहिए। बच्चों से संवाद करते हुए जाना कि बच्चे जीवन और प्रकृति को लेकर कितने सकारात्मक हैं. इनके बीच लैंगिक असमानता जैसी अवधारणा नहीं है। ये सह अस्तित्व में यकीन रखते हैं.
तीन :-
मेरे दिमाग़ में एक ऐसे स्कूल की कल्पना अरसे से सजोयी थी, जैसा कि मैंने तोतोचान, समरहिल, हरीघास की छप्पर वाली झोपड़ी और बौना पहाड़ में पढ़ा था। एहसास हुआ कि दीप्तकुल में जाने के बाद वह स्कूल मिल गया है। यदि सिनेमा का सन्दर्भ लें तो वह रेंचो का स्कूल है और शिक्षक तारे ज़मीं वाले।
और अंत में :- दीप्तकुल या स्पेस फॉर नरचरिंग क्रिएटिविटी (snc) में जीवन, सहजीवन और सहशिक्षा के माध्यम से विकसित होता है। जहाँ सचेत, संवेदनशील और रचनात्मक व्यक्ति एक साथ रहते हुए विविधता का सम्मान करते हैं। लैंगिक समानता पर यकीन रखते हैं. प्रकृति तथा अन्य जीवों के साथ सह अस्त्तित्व में भरोसा रखते हैं. बच्चों तथा उस रहवास सेंटर में रहने वाले सभी लोगों से मिलकर जीवन के प्रति नई उमंग और उत्साह से भर गया हूँ. अब मैं तरोताजा महसूस कर रहा हूँ और गुनगुना भी रहा हूँ: और भी गम हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा!
लेखक डॉ. संतोष तिवारी महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय से पीएचडी हैं। ग्राम पंचायत देवई जिला सीधी मध्यप्रदेश में रहते हैं। साहित्य, संगीत और रसोई के अध्ययन में विशेष रुचि है। इन दिनों समाज के बदलते हुए संबंधों और पब्लिक स्फीयर में बनते हुए किस्सो के अध्ययन में विशेष दिलचस्पी है।

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